बाज रही रण की भेदी
अब हो जाओ तैयार
उठा लो अब हथियार सत्य का,
करो असत संहार
कब तक सहते जाओगे
यूं ही चुप रहते जाओगे
सत्य नहीं वो, तुम जो कहते
जरा स्वयं को झांको तो
सही नहीं जो करते हो तुम
अपने कर्मों को आँकों तो
टूट रहा विश्वास स्वयं से
कैसे बच पाओगे
घोर घमंड में रहते हो
और व्यर्थ विवाद में पड़ते हो
चिंता की चार दिवारी में फंस
मर मर के फिर तुम मरते हो
होती बुद्धि नाश
अब कैसे चल पाओगे
डरते हो सबलो से तुम
निर्बल को आंख दिखाते हो
पिछुआ होकर चलते हो
स्वयं को आगे बताते हो
तुझे है अब धिक्कार
कैसे तुम रह पाओगे
साहस नहीं अब मेरा
जो कुछ मैं कर पाऊंगा
जीवन की लंबी राहों पर
अब मैं चल पाऊंगा
निकाल दो यह विचार कब तलक
यही कहते जाओगे
ऐसी पारी खेलो कि
चहुंओर गूंजे जयकारे
जय हो, विजय हो, जय हो, विजय हो
लगते रहे सदा नारे
बनकर कब पतवार
नईया पार लगाओगे
खुद से खुद को अब लड़ना है
औरों से नहीं लड़ाई है
सकार मन से, नकार मन की
सत और असत की लड़ाई है
जोरों से ललकार स्वयं को,
स्वयं ही जीत के आओगे
देखे सारा संसार
ऐसा पहचान बनाओगे....
बाज रही रण की भेदी
अब हो जाओ तैयार
उठा लो अब हथियार सत्य का,
करो असत संहार
कब तक सहते जाओगे
यूं ही चुप रहते जाओगे
लिखेश्वर साहू
9669874209
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