शुक्रवार, 22 दिसंबर 2023

बच्चों पर लेबललगाने से पहले सोचे

नहीं बेटा ये मत कर, नहीं बोला ना, नहीं मतलब नहीं,अरे ये तुम्हारे बस की बात नहीं है, अरे तू नहीं कर पाएगा, तू तो मूर्ख है, चल छोड़, रहने दे बोला ना, चल भग उधर, कुछ समझता ही नहीं है, डरपोक कहीं का, ये तो दब्बू है दब्बू, जीवन भर कुछ नहीं कर पाएगा तू, कुछ भी करते रहते हो, पढ़ाई तो करते नहीं हो कभी ,तू क्या करेगा जीवन में, तू तो गधा है गधा, जब देखो तब खाली डिस्टर्ब करते रहता है, बातूनी हो गया है, कम बोला कर, काम की बात बोला कर, मुंह बंद रखा कर, दिन भर खेलना बंद कर, ये सारे खिलौने बिखरा रखे है, बंद कर ये बाजार, दिन भर धमाचौकड़ी लगा रखी है, मुझे परेशान कर रखे हो, पागल है क्या, कुछ भी करता है, तुझमें अकल नहीं है, दिमाग में गोबर भर रखा है,इन शब्दों को बहुत बार सुना हुआ सा लगता है, अरे हां ये तो वही शब्द है जो कभी जानबूझकर,तो कभी आदतन, तो कभी अनायास ही अनजाने में अधिकांश माता पिता या पालकों के मुख से अधिकतर या कहे तो सामान्यतः मुख से निकल जाता है, औरों के ही नहीं अपने ही बच्चे जिनको हम यह बातें कह देते है , पालक होने के नाते हम किसी गलत मंशा से नहीं अपितु हम बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए सोचकर ही ऐसा बोल जाते है, पर सोचने वाली बात है की क्या सिर्फ ऐसे ही शब्दों का प्रयोग किया जाना आवश्यक है, क्या और कोई शब्द नहीं जिनका उपयोग सुझाव के लिए करें, क्या कोई विकल्प मौजूद नहीं जिनसे अपने बच्चों से बेहतर तरीके से व्यवहार कर पाएं, विकल्प तो ढेरों है पर हम ही सजग नहीं है उन विकल्पों के लिए, शब्दों का विस्तृत और समृद्ध भंडार भी है सबके पास क्योंकि सभी अपना काम निकलवाने बड़े रोचक और लुभावनी, चुटीले बातों,शब्दों का उपयोग कर ही जाते है, नेताओं और अधिकारी, संत और व्यापारियों से कैसे बातें करने है सभी जानते है, विनम्र बातें करना सभी जानते है, सभी रोज़ाना अपने अपने कार्यक्षेत्रों अच्छे अच्छे संवाद, मनोरंजक और दिलखुश करने वाली बातें कहते है सुनते है, संतो के प्रवचन, गुरुवाणी, मीठे भजन, सुविचार देख रहे है सुन रहे है, पर ऐसी कौन सी बाधाएं बांध जाती है जिनसे हम ऐसे ऐसे शब्द कह जाते है या ऐसा व्यवहार कर जाते है जो शायद अहितकर हो बच्चों के लिए , क्या  कभी आपका इस तरफ ध्यान गया है, क्या आप सुधार की मंशा रखते है, यदि ध्यान गया है, तो अच्छी बात है आप सोच रहे है सुधार की तो यह बड़ी बात है, बड़ी बात इसलिए की आपका ध्यान इस तरफ जाता है, और जिस तरफ हमारा ध्यान जाता है हम उनके लिए प्रयास करते है,हम जो बातें बच्चों को बोलते है उनका प्रभाव क्या होता है आइए जांचे, बच्चे को हम बोलना सिखाते है ,कैसे ,? उनके साथ ज्यादा से ज्यादा बातें बोलकर, ज्यादा से ज्यादा शब्दों को उनके शब्दकोश में भरने का काम रोज़ कर रहे है, हम जो बोल रहे है उनके शब्दकोश में भी शामिल हो रहा है और दिमाग में भी, जैसे वे अपने बड़ो को सुनेंगे वैसा उनके मुंह से भी निकलेगा फिर चाहे माता पिता, घर के कोई सदस्य या , गुरूजी जो भी हो उनके बोलने का प्रभाव पड़ता ही है, शब्दकोश से वाणी पर प्रबल प्रभाव पड़ता है, दिमाग़ में डाले गए सुझाव व्यवहार को निर्देशित करता है, ऐसे में यदि हम किसी बच्चे को कोई भी बात बोलते है जैसे रोजाना यदि हम उसे किसी एक ही बात को दुहराते रहे तो वे वैसा ही करते है, अनुभव करने की बात है, करके देखिए, रोज़ाना गाली डांट फटकार सुनने वाले बच्चे के मुंह से भी गाली या डांट सुनने को मिलेगा, उनके हाव भाव में  झिझक, क्रोध, भय बना रहेगा, सहमा सहमा सा रहेगा , प्रेम, स्नेह,दुलार पाने वाले का आत्मविश्वास बना रहता है, वह खुलकर बातें कहता है, बोलता है, अपनी अभिव्यक्ति कर पाता है,शायद आपने गौर भी किया हो , तो इस मामले में हमें सजग रहने की आवश्यकता है, और लोगों को भी सजग करने की आवश्यकता है, खुद भी समझे औरों को भी समझाएं....
यह विचार मुझे आया अपने विचारों को साझा करना मुझे उचित लगा तो मैंने किया,मेरी बातों से आप सहमत होते है या असहमत होते है ये आपकी बात है, वैसे इस तरह के विचारों पर मंथन किया जाना चाहिए बच्चों और बच्चों के विकास की बात है,
आपने समय निकाल कर पढ़ा आप जागरूक हैं,जागरूक होना चाहते हैं, इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद..........

लिखेश्वर साहू
9669874209

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