प्रिय पाठकों
जय जोहार
बचपन की कुछ पल है जो अक्सर याद आती है, वो स्मृतियां आपके समक्ष प्रस्तुत है...
क्या सुबह , क्या
दोपहरी , शाम- रात का भान नहीं
मस्त माहौल में
कूदे-खेले , मान अपमान का ज्ञान नहीं
कौन बूरे भले कौन
है, नहीं किसी का सुनते थे
होंगे कब गरमी की
छुट्टी , सपने मन में बुनते थे
रच मच कर हम झूला
करते कभी बरगद की डाली को
बैण्ड समझ हम कभी
बजाते अपने भोजन की थाली को
खेले खेल
कंचे-गिल्ली का, गली-गली चौराहों में
कभी हार हम घर जाके
रोते , लिपटे मां की बाहों में
कभी जीत हम मज़े
उड़ाते, फूले नहीं समाते थे
यूं लगता दिन भर
मेहनत कर , सदियों की पूंजी कमाते थे
छिपकर गिनते हम कंचे
को , मुस्काते थे मन ही मन
कभी दोस्त से से हो
जाती कट्टी, अनबन हो जाते थे थे हम
गिरते-पड़ते रटपट
दौड़े , जब स्कूल को देर हुए
कभी झिड़की टीचर की
पड़ती, कभी प्रेम के माल पुए
जब देर तक सोते रहते
बाबू जी के डांट सुनें
ममता भरी डांट सुनके
मां की, आज हम काबिल बनें
दादा जी की गालियों
में, हंसगुल्ले झरते थे
कभी छिपाके उनकी
लाठी , तंग खूब करते थे
मधुर याद बचपन की
मेरी जब भी मुझको आती है
कभी हंसाती कभी
रूलाती, वो यादें जब भी आती है...
लिखेश्वर साहू
ग्राम-सौंगा,पोष्ट-गिरौद,
तह-मगरलोड, जिला-धमतरी (छ.ग.)
9669874209
Kya khub likhate ho sir ji accha laga mere ko
जवाब देंहटाएंतोर ले तो सिखथो यार
हटाएं🙏🙏
जवाब देंहटाएंNice Bro...
जवाब देंहटाएंThanku
हटाएंNice 👍👍👍👍👍😊👏
जवाब देंहटाएंThanx
हटाएंBahut Sundar Bhai Likhu
जवाब देंहटाएं